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विकास कार्य स्थल पर लगे बोर्ड बने नेताओं के प्रचार का साधन

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निर्माण कार्यों के लागत छिपाने से बड़े भ्रष्टाचार की आ रही है बू, नगर प्रशासन की जवाबदेही पर खड़े हो रहे है सवाल।

वार्ड 13 में हुए सीसी रोड व नाली निर्माण के बोर्ड पर जनप्रतिनिधियों के नाम तो हैं, पर स्वीकृत धनराशि और कार्यदायी संस्था का जिक्र नहीं है।*

मोहम्मद नईम

कुशीनगर। नगर पालिका परिषद की कार्यप्रणाली इन दिनों गंभीर सवालों के घेरे में है। भ्रष्टाचार, लापरवाही और कमीशनखोरी का आलम यह है कि शहर में हो रहे विकास कार्यों में पारदर्शिता को पूरी तरह से ताक पर रख दिया गया है। नियमतः किसी भी सरकारी निर्माण कार्य के स्थल पर एक सूचना बोर्ड लगाना अनिवार्य होता है, जिस पर कार्यदायी संस्था या ठेकेदार का नाम, निर्माण की स्वीकृत धनराशि, कार्य की कुल लागत, निर्माण की दूरी/लंबाई और कार्य प्रारंभ तथा समाप्त होने की तिथि स्पष्ट रूप से लिखी होनी चाहिए। लेकिन, कुशीनगर नगर पालिका क्षेत्र में लग रहे शिलान्यास और लोकार्पण बोर्डों से ये सभी महत्वपूर्ण जानकारियां नदारद हैं।

​हैरानी की बात यह है कि ये बोर्ड अब जनता को उनके पैसों के इस्तेमाल की जानकारी देने के बजाय, केवल जनप्रतिनिधियों के प्रचार का साधन बनकर रह गए हैं। देश और प्रदेश में पारदर्शी शासन का दावा करने वाली 'ट्रिपल इंजन' की सरकार सत्ता में है। इसके बावजूद, स्थानीय नगर प्रशासन और पालिका अध्यक्ष की कार्यप्रणाली पर लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं। आखिर क्यों कार्यदायी संस्था और ठेकेदार का नाम बोर्ड पर लिखने से परहेज किया जा रहा है? क्यों स्वीकृत धनराशि को जनता से छिपाया जा रहा है? क्या इसके पीछे किसी बड़े भ्रष्टाचार या सुनियोजित घोटाले को छिपाने की कवायद चल रही है या महज नगर प्रशासन की लापरवाही?


वार्ड नंबर 13 राम जानकी नगर का मामला खोल रहा है पोल:-

नगर पालिका की इस अपारदर्शी और लचर व्यवस्था का जीता-जागता उदाहरण वार्ड नंबर 13 राम जानकी नगर में देखने को मिल रहा है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, राज्य वित्त आयोग के अंतर्गत वित्तीय वर्ष 2023-24 में यहां एक सीसी (सीमेंट कंक्रीट) रोड और नाली का निर्माण कराया गया है। यह निर्माण कार्य शारदा मद्धेशिया के घर से शुरू होकर चन्द्रबली व संजय यादव के घर से होते हुए प्रभु के घर तक किया गया है।

जब इस निर्माण स्थल पर लगे सूचना बोर्ड पर नजर डाली गई, तो जमीनी हकीकत बेहद चौंकाने वाली मिली। बोर्ड पर न तो उस ठेकेदार या कार्यदायी संस्था का नाम दर्ज है जिसने यह ठेका लिया है, और न ही यह बताया गया है कि इस नाली और सड़क निर्माण के लिए सरकार द्वारा कितनी धनराशि स्वीकृत की गई थी। निर्माण की कुल दूरी और कार्य अवधि का भी कोई जिक्र नहीं है।

जनता के टैक्स से सिर्फ नेताओं की ब्रांडिंग:-

इस सरकारी बोर्ड पर सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक रसूख और चमक-दमक दिखाई देती है। इसमें सूबे के मुख्यमंत्री, नगर विकास मंत्री, स्थानीय सांसद, विधायक, नगर पालिका अध्यक्ष और वार्ड के सभासद का नाम बड़े-बड़े अक्षरों में उकेरा गया है। इसे देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि नगर पालिका द्वारा कराए जा रहे विकास या निर्माण कार्यों के स्थल पर लगे बोर्ड केवल नेताओं के राजनीतिक प्रचार के पोस्टर मात्र हैं। आम करदाता, जिसके पैसों से यह निर्माण हो रहा है, उसे यह जानने का कोई हक नहीं दिया जा रहा है कि उसके वार्ड में कितने रुपये का काम हो रहा है।

 जवाबदेही शून्य, भ्रष्टाचार को मिल रहा खुला संरक्षण:-

सूचना बोर्ड पर लागत और ठेकेदार का नाम न होने से सबसे बड़ा नुकसान निर्माण की गुणवत्ता का होता है। यदि सड़क या नाली निर्माण में पीला ईंट, घटिया सीमेंट या खराब सामग्री का इस्तेमाल होता है, तो स्थानीय नागरिक शिकायत किससे करें, जब उन्हें ठेकेदार का नाम ही नहीं पता? स्वीकृत धनराशि न लिखे होने से ठेकेदार और भ्रष्ट अधिकारी मिलीभगत करके कागजों में पूरा पैसा दिखा कर, मौके पर आधा-अधूरा और गुणवत्ताहीन काम कर के शेष रकम डकार सकते हैं। यह सीधे तौर पर जवाबदेही से भागने और भ्रष्टाचार को संस्थागत रूप देने का तरीका है।

उच्च स्तरीय जांच की दरकार:-

कुशीनगर नगर पालिका का यह रवैया इस बात का पुख्ता गवाह है कि सिस्टम में जवाबदेही का अब कोई स्थान नहीं बचा है। शहर की जागरूक जनता अब यह सवाल पूछ रही है कि क्या कमीशनखोरी के चलते लागत को छिपाने का खेल चल रहा है?

समय रहते यदि जिलाधिकारी कुशीनगर और शासन स्तर के उच्चाधिकारियों ने नगर पालिका के इन 'प्रचार बोर्डों' के पीछे छिपे खेल की जांच नहीं की, तो जनता की गाढ़ी कमाई यूं ही भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती रहेगी। जरूरत है कि इन सभी निर्माण कार्यों का तकनीकी व भौतिक सत्यापन कराया जाए, बिना मानक वाले बोर्ड तत्काल बदले जाएं और ठेकेदार का नाम तथा लागत छिपाने वाले दोषी अधिकारियों पर सख्त विभागीय कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

अधिशासी अधिकारी बोली:-

इस संबंध में जब अधिशासी अधिकारी अंकिता शुक्ला से पूछा गया कि विकास/निर्माण कार्य स्थल पर शिलापट लगे है और शिलापट पर निर्माण कार्य की धनराशि और दूरी/क्षेत्रफल नहीं लिखा है, इसके अतिरिक्त अन्य कोई शिलापट कार्य स्थल पर नहीं लगाया गया है, तो कहा कि यह शिलापट केवल शिलान्यास और लोकापर्ण का होता है। जब कोई परियोजना आती है, केंद्र व राज्य अंश या फिर परियोजना होती है, उन कार्यों में लिखा जाता है। इस तरह के कार्यों में धनराशि/क्षेत्रफल दूरी तथा कार्यदायी संस्था/ठेकेदार नाम नहीं लिखा जाता है।

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